Mysore Dynasty in Hindi

 

Mysore Dynasty in Hindi
Mysore Dynasty in Hindi

मैसूर 

1565 ई. में तालीकोटा के युद्ध के बाद विजयनगर का पतन हो गया। इसके उपरान्त वहां अरविन्दु वंश की स्थापना हुई। 1612 ई. में अरविन्दु वंश के शासक बैंकट द्वितीय के समय मैसूर में वाडियार राजवंश की स्थापना हुई। 18वीं शताब्दी के मध्य में मैसूर का राजा चिक्का कृष्णराज था, परन्तु वास्तविक शक्ति नन्दराज (सेनापति) एवं देवराज (वित्त मंत्री) के हाथों में थी। बाद में नन्दराज ही मैसूर का सर्वेसर्वा हो गया। इसी समय हैदर अली नामक एक योग्य व्यक्ति नन्दराज की सेना में भर्ती हुआ। 1761 ई. में हैदर अली ने राजमाता की सहायता से नन्दराज की शक्ति का अन्त कर मैसूर राज्य का वास्तविक स्वामी बन गया।


हैदर अली ( 1761-82 ई.) 

हैदर अली ने अपनी राजधानी मैसूर से श्रीरंगपट्टनम् में स्थानान्तरित की। उसने अंग्रेजों एवं मराठों की शक्ति का सामना करने हेतु फ्रांसीसियों की सहायता से डिंडीगुल में आधुनिक शस्त्रागार की स्थापना की। दक्कन में भारतीय ताकतों में हैदर अली पहला व्यक्ति था, जिसने अंग्रेजों को पराजित किया। द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान हुए पोर्टोनोवा के युद्ध में घायल हो जाने के कारण 1782 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।


टीपू सुल्तान ( 1782-99 ई.)

हैदर अली की मृत्यु के बाद उसका पुत्र टीपू मैसूर का शासक बना। टीपू ने अफगानिस्तान, ईरान, कुस्तुंतुनिया, मॉरीशस एवं फ्रांस आदि देशों में दूत भेजे तथा विदेशों में आधुनिक पद्धति से दूतावास स्थापित किए। टीपू ने फ्रांस के शासक नेपोलियन के साथ विदेशी संबंध स्थापित किए तथा श्रीरंगपट्टनम् में फ्रांसीसी झण्डा लहराया और स्वतंत्रता का वृक्ष लगाया। वह जैकोवियन क्लब का सदस्य बना तथा नागरिक टीपू कहलाना पसंद किया। टीपू ने अपने राज्य में आधुनिक कैलेण्डर लागू किया, सिक्का ढलाई की नई तकनीक तथा नापतौल के आधुनिक पैमाने अपनाए। टीपू धार्मिक रूप से सहिष्णु शासक था, उसने शृंगेरी मंदिर में देवी शारदा की मूर्ति के निर्माण हेतु धन दिया था। 1799 ई. में चुतर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध में लड़ते हुए टीपू सुल्तान की मृत्यु हो गई। 


प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध ( 1767-69 ई.)

हैदर अली की फ्रांसीसियों से मैत्री को आंग्ल-मैसूर युद्ध का कारण माना जाता है। इस युद्ध में मराठे व निजाम अंग्रेजों की तरफ थे, किन्तु आगे हैदर अली ने मराठों को धन का तथा निजाम को क्षेत्र का प्रलोभन देकर अंग्रेजों से अलग कर दिया। फिर हैदर अली ने अंग्रेजों को पराजित करते हुए मद्रास व मैंगलोर पर अधिकार कर लिया। अंततः विवश होकर अंग्रेजों ने हैदर अली से मद्रास की संधि ( 1769 ई.) कर ली, जिसके अनुसार दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के क्षेत्र तथा राजनीतिक कैदी वापस कर दिए। साथ ही दोनों पक्षों ने आश्वासन दिया कि यदि किसी पर कोई तीसरी शक्ति आक्रमण करती है, तो दोनों एक-दूसरे की मदद करेंगे। इस संधि से अंग्रेजों की प्रतिष्ठा को धक्का लगा, क्योंकि एक भारतीय शक्ति ने संधि की शर्ते निश्चित की थी। इस युद्ध ने अंग्रेजों की अजेयता को भी समाप्त कर दिया। 


द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध ( 1780-84 ई.)

इस युद्ध के कई कारण थे। प्रथम, 1771 ई. में मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया, परन्तु अंग्रेजों ने सहायता नहीं की, अतः संधि टूट गई। द्वितीय, हैदर अली ने भी फ्रांसीसियों के साथ मेल-मिलाप की नीति अपनाई । तृतीय, इस युद्ध का तात्कालिक कारण यह था कि अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ हो जाने से अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों में प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई। इससे अंग्रेजों ने फ्रांसीसी बस्ती माहे पर कब्जा कर लिया। माहे हैदर अली के संरक्षण में था तथा यहां से हैदर अली को आवश्यक गोला-बारूद की आपूर्ति होती थी। अत: हैदर अली ने निजाम व मराठों के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध आक्रमण कर दिया, किन्तु शीघ्र ही अग्रेजों ने मराठों से 1782 ई. में सालवाई की संधि कर ली, जिससे मराठे हैदर अली से अलग हो गए। उसी प्रकार अंग्रेजों ने निजाम को भी गुंटूर का क्षेत्र देकर उसे अपने पक्ष में कर लिया।


हैदर अली ने दृढ़तापूर्वक इस स्थिति का सामना किया, परन्तु 1781 ई. में पोर्टोनोवा के युद्ध में अंग्रेज सेनापति सर आयरकूट से वह पराजित हुआ। इस युद्ध में लगी चोटों के कारण 1782 ई. को हैदर की मृत्यु हो गई। इसके उपरान्त युद्ध का नेतृत्व हैदर अली के पुत्र टीपू सुल्तान ने संभाला। 1783 ई. में टीपू ने ब्रिगेडियर मैथ्यूज को पराजित कर सेना सहित बंदी बना लिया। किन्तु इसी वर्ष पेरिस की संधि द्वारा अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम समाप्त हो गया, जिससे फ्रांसीसी युद्ध से अलग हो गए। टीपू ने भी अंग्रेजों से संधि करना उचित समझा और 1784 ई. में मैंगलोर संधि के द्वारा दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के विजित प्रांत एवं राजनीतिक कैदी वापस कर दिए।

मंगलोर की संधि लॉर्ड मैकार्टनी एवं टीपू के बीच हुई थी। तत्कालीन गर्वनर वॉरेन हेस्टिंग ने इस संधि की शर्तों को नापसंद करते हुए कहा कि “यह लॉर्ड मैकार्टनी कैसा आदमी है ! मैं अभी भी विश्वास करता हूं कि वह संधि के बावजूद कर्नाटक को खो देगा।” 

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध ( 1790-92 ई.) 

इस युद्ध का तात्कालिक कारण यह था कि 1789 ई. में त्रावणकोर के राजा ने डचों से क्रेगानूर व जैकोटा के दुर्ग खरीद लिए, जबकि ये दुर्ग टीपू खरीदना चाहता था। टीपू ने त्रावणकोर पर आक्रमण कर दिया। त्रावणकोर अंग्रेजों का मित्र राज्य था, अतः अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड कार्नवालिस ने भी टीपू के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। कार्नवालिस, मराठा और निजाम की सेना ने श्रीरंगपट्टम् को घेर लिया। अंततः विवश होकर टीपू ने श्रीरंगपट्टम् की संधि ( 1792 ई.) कर ली, जिसके अनुसार बारामहल, डिण्डीगुल व मालाबार अंग्रेजों को, तुंगभद्रा नदी का उत्तरी भाग मराठों को तथा पेन्नार व कृष्णा नदी के बीच का भाग निजाम को मिला। टीपू के 2 पुत्र क्षतिपूर्ति प्राप्त होने तक कार्नवालिस के पास बंधक के रूप में रखे गए । कार्नवालिस ने इस संधि पर टिप्पणी की कि “हमने अपने मित्रों को अधिक शक्तिशाली बनाए बिना अपने शत्रु को पंगु कर दिया।"

कार्नवालिस के बाद सर जॉन शोर गवर्नर जनरल बना, परन्तु उसने मैसूर के प्रति अहस्तक्षेप की नीति अपनाई। इसी कारण जॉन शोर को अहस्तक्षेप की नीति का जन्मदाता माना जाता है। आगे चलकर सर जॉन लॉरेन्स ने भी अफगानिस्तान के प्रति अहस्तक्षेप की नीति अपनाई थी। 


चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध ( 1799 ई.)

1799 ई. में लॉर्ड वेल्जली ने टीपू के पास सहायक संधि का प्रस्ताव भेजा, किन्तु टीपू ने उसे अस्वीकार कर दिया। वेल्जली ने टीपू सुल्तान पर दोष लगाया कि वह निजाम तथा मराठों के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध षड्यंत्र रच रहा है तथा 1799 में युद्ध की घोषणा कर दी। अंग्रजों ने श्रीरंगपट्टम् को घेर लिया तथा टीपू युद्ध लड़ते हुए मारा गया। इस तरह 1799 में अंग्रेजों ने श्रीरंगपट्टम् पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों ने मैसूर के कुछ प्रदेश निजाम को देकर शेष प्रदेशों को अपने साम्राज्य में शामिल कर 1800 ई. में मद्रास प्रेसिडेंसी की स्थापना की। मैसूर के छोटे से क्षेत्र को वाडीयार वंश के 2 वर्षीय बालक कृष्णराज को राजा बनाकर अंग्रेजों ने अपने संरक्षण में ले लिया तथा मैसूर पर सहायक संधि लाद दी गई।


चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध की सफलता के बाद गवर्नर जनरल वेल्जली ने कहा कि "अब पूरब का राज्य हमारे कदमों में है।"

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