Indus valley Civilization in Hindi

 


  


 हड़प्पा सभ्यता :

➜ भारत में प्रागैतिहासिक स्थलों को खोजने का कार्य भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग  करता है।

➜ भारतीय पुरातत्व विभाग के जन्मदाता अलेक्जेंडर कनिंघम को माना जाता है।

➜ भारतीय पुरातत्व विभाग की नींव वॉयसराय लार्ड कर्जन के काल में पड़ी।

➜ जब भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक जान मार्शल थे, तब दयाराम साहनी ने 1921 ई० में हड़प्पा की तथा राखलदास बनर्जी ने 1922 ई० में मोहनजोदड़ो की खोज की।

➜ इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता, सिन्धु  घाटी सभ्यता, सिन्धु-सरस्वती सभ्यता, काँस्य युगीन सभ्यता, प्रथम नगरीय क्रान्ति के नाम से जाना जाता है।


इस  सभ्यता का  कालक्रम :

3500 ई०पू० से 1300 ई०पू० - यह काल-क्रम रेडियो कार्बन विधि के आधार पर निर्धारित किया गया है।इसके तीन चरण निम्नलिखित हैं

➜ पूर्व हड़प्पाई चरण - लगभग 3500 ई० पू० से 2600 ई० पू०

➜ परिपक्व हड़प्पाई चरण- लगभग 2600 ई० पू० से 1900 ई० पू०

➜ उत्तर हड़प्पाई चरण - लगभग 1900 ई०पू० से 1300 ई० पू०


➜ 3250 ई० पू० से 2750 ई० पू० - जॉन मार्शल

➜ 2500 ई०पू० से 1500 ई०पू० - मार्टीमर व्हीलर

➜ 2350 ई० पू० से 1750 ई० पू० - डी० पी० अग्रवाल

➜ 2800 ई० पू० से 2500 ई० पू० - मैके

➜ 2900 ई० पू० से 1900 ई० पू० - डेल्स

➜ 3500 ई० पू० से 2500 ई० पू० - एम० एस० वत्स


सिन्धु सभ्यता के निर्माता :

हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न स्थलों से चार मानव प्रजातियों के कंकाल प्राप्त हुए है।

➜ प्रोटोआस्ट्रेलायड

➜ मेडिटेरियन

➜ मंगोलायड

➜ अल्पाइन

➜ इनमें सर्वाधिक कंकाल मेडिटेरियन के प्राप्त हुए हैं , इसीलिए इन्हें हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख निर्माता माना जाता है ।

➜ मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांसे से बनी नृत्यरत नारी की मूर्ति प्रोटोआस्ट्रेलायड प्रजाति की हैं।

➜ मोहनजोदड़ो से ही प्राप्त पुरोहित की मूर्ति मंगोलायड प्रजाति की है  ।


विदेशी उद्भव का मत - मार्शल, व्हीलर, गार्डन चाइल्ड केयर एवं डी० डी० कौशाम्बी ,क्रेमर ,एच० डी० साँकलिया

स्वदेशी उद्भव का मत उद्भव - फेयर सर्विस, अमलानन्द घोष, आल्चिन-दम्पत्ति, एस० आर० राव एवं डी० पी० अग्रवाल


वर्तमान तीन देशों अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत में इसका विस्तार मिलता है।

सिन्धु घाटी सभ्यता का विस्तार : उत्तरी छोर - मांडा (जम्मू-कश्मीर), दक्षिणी छोर – दैमाबाद (महाराष्ट्र), पूर्वी छोर – आलमगीरपुर (उत्तर प्रदेश) एवं पश्चिमी छोर सुत्कांगेड़ोर (बलूचिस्तान)

प्राक सैंधव क्षेत्र :

➜ बलूचिस्तान - मेही,झाँब, क्वेटा, नाल,किलेगुलमुहम्मद, कुल्ली,  मेहरगढ़,  पीराकदंब, अंजीरा,नून्दरा  यहाँ के प्रमुख स्थल हैं।

➜ मेहरगढ़ प्राक् सैंधव का सबसे प्राचीन स्थल है।

➜ मेही के कब्र से सिर-रहित स्त्री की आकृति से युक्त ताम्रदर्पण मिला है।

➜ सिन्ध- कोटदीजी एवं आमरी सिन्ध क्षेत्र के प्राक् हड़प्पाई स्थल हैं।

➜ आमरी की खोज एवं उत्खनन 1929 में एन.जी. मजूमदार ने किया।  यहाँ से बारहसिंगा का प्रमाण मिलता है। राइनो (गैंडा) की हड्डियां केवल आमरी से मिलती हैं।

➜ कोटदीजी - सिन्धु नदी के बाँए तट पर स्थित है। कोटदीजी का अन्त दो भंयकर अग्निकाण्डों से हुआ था। 

भारत में प्राक सैंधव क्षेत्र :

➜ राजस्थान - सोधी,कालीबंगा

➜ पंजाब - रोहिल, मसोरसना

➜ हरियाणा - बनावली,भीरणा, सिसवाल और बालू , राखीगढ़ी, कुणाल

➜ गुजरात- पादरी,  धौलावीरा और कुन्तासी


सैंधव स्थल :

अफगानिस्तान- मुण्डिगाक और सोर्तुघई  

➜ मुण्डिगाक -  अरघनदाब नदी के किनारे है। इसका उत्खनन जे.एम. कसाल ने किया था।

➜ सोर्तुघई - स्थिति- आक्सस एवं कोकचा नदियों के संगम पर  यंहा से  एक जुता हुआ खेत मिला है।

पाकिस्तान में दक्षिणी ब्लूचिस्तान, सिन्ध एवं पंजाब

➜ दक्षिण बलूचिस्तान-  सुत्कांगेनडोर, सोत्काकोह, बालाकोट, नोनदौरी एवं डाबरकोट हैं।

➜ सिन्ध - मोहनजोदड़ो, चन्हुदड़ो, जुडेरजोदड़ों,नगूर, कोटदीजी, आमरी, अलीमुराद, थारोवारोदड़ो, लखुइंजोदड़ो

➜ पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त  - हड़प्पा, डेराइस्माइल खाँ, जलीलपुर, रहमानढेरी, गुमला एवं चकपुरबाने

भारत में स्थित सैंधव स्थल :

➜ जम्मू- कश्मीर में माण्डा

➜ पंजाब  - रूपनगर (रोपड़) ,  कोटलानिहंगखान , चक 86 , बाड़ा , संघोल , ढेर-माजरा, ढालेवा

➜ हरियाणा- बनवाली, मिताथल, सिसवल, बखावली, राखीगढ़ी और बालू, मोरवाला,हिंडोल

➜ राजस्थान- कालीबंगा, बालाथल

➜ गुजरात -  कच्छ की खाड़ी में तीन प्रमुख स्थल हैं देशलपुर, सुरकोटदा तथा धौलावीरा  और  खम्भात की खाड़ी के स्थलों में लोथल, रंगपुर, रोजदी, प्रभास पाटन, भगतराव, नागेश्वर, कुन्तासी, मेघम, शिकारपुर प्रमुख हैं।

➜ उत्तर प्रदेश- आलमगीरपुर (मेरठ में); बड़गाँव एवं हुलास (सहारनपुर में); माण्डी (मुजफ्फरनगर में)

प्रमुख सैंधव स्थल :

स्थल

अवस्थिति

नदी

खोजकर्ता

हडप्पा

पंजाब (पाकिस्तान)

रावी

दयाराम साहनी

मोहनजोदड़ो

सिंध (पाकिस्तान)

सिन्धु

राखलदास बनर्जी

माण्डा

जम्मू-कश्मीर (भारत)

चेनाब नदी

जे.पी. जोशी  तथा मधुबाला

दैमाबाद

महाराष्ट्र (भारत)

प्रवरा नदी

बी. पी. बोपार्डिकर

आलमगीरपुर

उत्तर प्रदेश (भारत)

हिण्डन नदी

यज्ञदत्त शर्मा

सुत्कांगेडोर

बलूचिस्तान(पाकिस्तान)

दाश्क  नदी

ऑरेल स्टाइन

मुण्डिगाक  

अफगानिस्तान

अरघनदाब

जे.एमकसाल

सोर्तुघई

अफगानिस्तान

आक्सस एवं कोकचा नदियों के संगम पर

 

सोत्काकोह

बलूचिस्तान(पाकिस्तान)

शादी कौर नदी

जॉर्ज एफ.डेल्स

बालाकोट

बलूचिस्तान(पाकिस्तान)

विन्दार नदी

जॉर्ज एफ.डेल्स

डाबरकोट

बलूचिस्तान(पाकिस्तान)

 

आरेल स्टाइन

चन्हुदड़ो

सिंध (पाकिस्तान)

सिन्धु नदी

मजूमदार और मैके

कोटदीजी

सिंध (पाकिस्तान)

सिन्धु नदी

धुर्वे

आमरी

सिंध (पाकिस्तान)

सिन्धु नदी

 N G मजूमदार

डेराइस्माइल खाँ

पंजाब (पाकिस्तान)

गोमल नदी

 

रहमानढेरी

पंजाब (पाकिस्तान)

गोमल नदी

 

रोपड़ 

पंजाब (भारत)

सतलज

यज्ञदत्त शर्मा

बनवाली

हरियाणा (भारत)

रंगोई  नदी

आर. एस. विष्ट

राखीगढ़ी

हरियाणा (भारत)

घग्घर नदी 

सूरजभान

कालीबंगा 

 राजस्थान (भारत)

घग्घर नदी 

अमलानन्द घोष और ब्रजवासी लाल

सुरकोटदा

गुजरात (भारत)

 

जे. पी. जोशी

लोथल

गुजरात (भारत)

भोगवा नदी

एस. आर. राव

रंगपुर

गुजरात (भारत)

मादर नदी

माधोस्वरूप वत्स

रोजदी

गुजरात (भारत)

मादर नदी

 

प्रभास पाटन

गुजरात (भारत)

हिरण्य नदी

 

भगतराव

गुजरात (भारत)

किम नदी

 

बड़गाँव

उत्तर प्रदेश (भारत)

मस्कारा नदी

 

धौलावीरा 

गुजरात (भारत)

मनहर और मनसर नदी

आर. एस. विष्ट और जे पी जोशी

हड़प्पा : रावी नदी के बायें तट पर पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित। 1921 में दयाराम साहनी , उनके पश्चात् माधवस्वरूप वत्स तथा वत्स के पश्चात् 1946 में सर मार्टिन व्हीलर ने उत्खनन किया। 1964-65 में जार्ज डेल्स ने उत्खनन कराया।

हड़प्पा से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य :

➜  हड़प्पा के सभी घरों से शौच (Toilets) स्थानों के अवशेष मिले हैं।

➜ एक  टीला मिला है, जिसे F टीला  कहा गया।  इस F टीले पर अनाज कूटने का 18 वृत्ताकर चबूतरा,  श्रमिक आवास  मिला है। यहीं से ओखली पर जले हुए गेहू एवं जौ की भूसी का साक्ष्य मिलता है।

➜ R-37 हड़प्पा में खोजा गया एक कब्रिस्तान है जो सिन्धु सभ्यता काल का है साथ में ही एक समाधि H भी खोजी गयी जो सिन्धु सभ्यता के परवर्ती काल की है।

➜ ताँबे की इक्कागाडी, ताँबे का पैमाना, ताँबे का ताबीज, प्रसाधन केस,गधे की हड्डियाँ

➜ हड़प्पा के लोग सर्वाधिक रूप से गठिया से पीड़ित थे।

➜  हड़प्पा के कब्र में एक बच्चे को एक स्त्री के साथ दफनाये जाने का साक्ष्य मिला है। इस महिला की प्रसव के दौरान मृत्यु हुई थी।

➜ हड़प्पा की एक कब्र से प्राप्त ताम्र दर्पण  पर लिपटे सूती धागे, ताँबे के उस्तरों के हत्थों पर तथा फेयंस पात्रों के भीतर मिले हैं। यहाँ से मिट्टी की मूषा मिली है जिसका प्रयोग ताँबा गलाने में होता है।

➜ कांसा का ढक्कन वाला विशाल भोजन तैयार करने का पात्र प्राप्त हुआ है।

➜ शंख से निर्मित बैल; शंख से बने पात्रों पर चाँदी जड़े जाने का साक्ष्य; मातृदेवी की मृणमूर्तियाँ आदि मिली हैं। 

➜ हड़प्पा से प्राप्त एक मुहर पर गरूड पक्षी साँप को पकड़े हुए ।

➜ यहाँ के मृदभाण्डों पर दूध पिलाती हिरणी, जाल के साथ मछुवारे आदि का अंकन हुआ है।

➜ मिट्टी की बनी टोकरी का एकमात्र साक्ष्य हड़प्पा से मिलता है।

➜ स्टुअर्ट पिग्गट ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वां राजधानियां बताया है। 


मोहनजोदड़ो : सिन्धु नदी के दायें तट पर पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में स्थित । 1922 ई. में राखलदास बनर्जी ने खोजा बाद में जॉन मार्शल एवं उसके साथियों ने उत्खनन किया उसके बाद जे.एच मैके ने उत्खनन किया उसके बाद जे. एफ. डेल्स ने उत्खनन किया।

मोहनजोदड़ों से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य :

➜ मोहनजोदड़ों के गढ़  पर एक मीनार पाया गया है।

➜ युनिकोर्न प्रतीक वाली चाँदी की दो मुहर

➜ वस्त्र निर्माण का प्राचीनतम साक्ष्य

➜ मलेरिया बीमारी का प्राचीनतम साक्ष्य

➜ 20 खंभो (27 × 27 मी.) वाला एक सभा भवन या स्तम्भों वाला भवन मिला है। इसे मैके ने अपनी पुस्तक 'फरदर एक्सकेवेशन ऐट मोहनजोदड़ो' में बाजार कहा है।

➜ एक मुहर पर सुमेरियन नावों का चित्रांकन प्राप्त चाँदी का प्राचीनतम साक्ष्य

➜ एक 50x27 मी. का अन्नागार  मिला है जोकि मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारती संरचना है।

➜ विश्व में वाटर प्रूफिंग का प्रथम साक्ष्य

➜ एक ऐसी मुद्रा प्राप्त हुई है जिस पर एक व्यक्ति दो बाघों से लड़ते हुए अंकित है।

➜ बड़ी संख्या में कुओं की प्राप्ति

➜ यहाँ से  कांस्य कुल्हाड़ी, कांसे की नर्तकी की मुहर मिली है।

➜ यहाँ से एक सुन्दर ताम्रकुठार; शलाकायुक्त तलवारें प्राप्त हुई हैं।

➜ मोहनजोदड़ो से हाथीदांत पर बनी पुरुष आकृति मिली है जो टोपी एवं लंगोटा पहने हुए है, पीठ पर धनुष है तथा दोनों हाथ कमर पर टिके हैं।

➜ यहाँ से हाथी का कपालखण्ड भी प्राप्त हुआ है।

➜ पशुपति की मुहर प्राप्त

➜ मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर सात लोग कतार से खड़े हैं। इसे सप्तर्षि  का प्राचीनतम प्रमाण माना गया है।

➜ वृहद् स्नानागार की प्राप्ति

➜ यहाँ से कोई कब्रिस्तान नहीं मिला


कालीबंगा : अमलानन्द घोष ने 1952 ई. में , उत्खनन- बी.बी. लाल एवं वी. के. थापड़ ने किया। कालीबंगा सैंधव सभ्यता में चूड़ी निर्माण का केन्द्र था। कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ काले रंग की चूड़ियां होती है।

कालीबंगा  से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य :

➜ कालीबंगा से 'प्राक् सैंधव काल' से सम्बन्धित एक जुता हुआ खेत मिला है।

➜ लकड़ी की नाली

➜ यहाँ  पर स्पष्ट या शहरी जल निकास प्रणाली का अभाव दिखता है।

➜ इसके निचले-नगर की भी किलेबन्दी की गयी थी।

➜ सड़कों को पक्का बनाने का प्रमाण यहीं से मिलता है

➜ कालीबंगा के तीसरे टीले पर 7 आयताकार यज्ञवेदियाँ तथा यहीं से थोड़ी दूरी पर एकल यज्ञवेदी मिली है।

➜ कालीबंगा से मातृदेवी की कोई मूर्ति नहीं मिली है। टेराकोटा से बने लिंग-योनिपीठ, पत्थर का बना एक आधार वाला लिंग तथा सींग वाले देवता की टेराकोटा प्रतिमा यहाँ से प्राप्त हुए। है।

➜  यहाँ से एक युग्म शवाधान का साक्ष्य मिलता है।

➜ कालीबंगा से ही शवों को अंत्येष्टि संस्कार के तीनों विधियों का पता चलता है।

➜ कालीबंगा के मुहरों पर बांध की आकृति मिलती है।

➜ यही से भूकंप का प्राचीनतम प्रमाण मिलता है।

➜ मृणपट्टिका पर सींगुयक्त देवता की आकृति का अंकन है।

➜ ऊँट की हड्डियां कालीबंगा से मिलती हैं।

➜ कालीबंगा से प्राप्त एक बालक की खोपड़ी में छः छेद हैं जोकि शल्य चिकित्सा का प्रमाण है।

➜ हाथी दांत की कंघी, कांस्य दर्पण,पैर से चलने वाली चक्की प्राप्त हुई है


चन्हूदड़ो : यह सिन्धु नदी के तट पर सिन्ध प्रान्त में स्थित है। एन.जी. मजूमदार' ने 1931 ई. में उत्खनन- 1935 में मैके ने किया।

चन्हूदड़ो से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य :

➜ इसे सैंधव सभ्यता का औद्योगिक शहर कहा गया है।

➜ चन्हूदड़ो की किलेबन्दी नहीं की गई थी।

➜ मैके ने यहाँ से मनके बनाने का कारखाना खोजा।

➜ यहीं से मिट्टी की पकी हुई नालियों के प्रयोग का साक्ष्य प्राप्त होता है।

➜ यहाँ से प्राप्त एक ईंट पर कुत्ते द्वारा बिल्ली का पीछा किये जाने का चिन्ह मिला है।

➜ ताँबे का मत्स्य कोटा, भाला फेंकते हुए पुरुष नर्तक की खण्डित मूर्ति: मृण-गाड़ी का माडल मिला है। एक माडल में गाड़ीवान के हाथ में चाबुक दिखाया गया है।

➜ मुहरों पर तीन घड़ियालों तथा दो मछलियों का अंकन आदि के साक्ष्य चन्हूदड़ो से मिले हैं।

➜ महिला सौन्दर्य प्रसाधन जैसे- रंजनशलाका (लिपिस्टिक), काजल, पाउडर तथा वक्राकार ईंट  स्याही दवात आदि मिले हैं।

➜ यहीं से झूकर-झांगर संस्कृति के अवशेष मिलते हैं। यह संस्कृति सिन्धु संस्कृति के बाद विकसित हुई। चन्हूदड़ो में झूकर संस्कृति चरण के बाद झांगर संस्कृति वालों ने अपना निवास स्थान बनाया।


लोथल : भोगवा नदी के तट पर गुजरात के अहमदाबाद जिले में स्थित। 1954 ई. में एस. आर. राव ने खोजा एवं उत्खनन कार्य किया। एस.आर. राव ने इसको लघु हड़प्पा या लघु मोहनजोदड़ो कहा।

लोथल से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य :

➜ लोथल की सम्पूर्ण बस्ती एक ही रक्षा प्राचीर से घिरी थी

➜ यहाँ से एक बंदरगाह की खोज हुई है। यह विश्व का प्राचीनतम ज्ञात गोदीबाड़ा है। इसके उत्तरी दीवार में 12 मी. चौड़ा प्रवेश द्वार था, जिससे होकर जहाज  आते-जाते थे।

➜ यहाँ से फारस की खाड़ी प्रकार की मुहर प्राप्त हुई

➜  यहाँ से गोरिल्ला की मृण्मूर्ती प्राप्त हुई है

➜ यहाँ से ममी प्राप्त हुई है

➜ लोथल से 3 युग्म शवाधान का साक्ष्य मिला है। जिसमें पुरुष एवं स्त्री को एक साथ दफनाया गया था। एस. आर. राव इसे सती प्रथा  मानते हैं।

➜ यहाँ से लकड़ी का अन्नागार, घोड़े की मृणमूर्ती एवं नाव का एक मॉडल प्राप्त हुआ है।

➜ यहाँ से विष्णुशर्मा के पञ्चतंत्र की चालाक लोमड़ी की आकृति, आटा पीसने की चक्की के दो पाट, हाथी दांत की स्केल

➜ लोथल से तांबे की मूर्ति मिली है। ये बतख या हंस, खरगोश, कुत्ता एवं वृषभ की हैं। ताँबे की एक मानवाकृति  का नमूना यहाँ से प्राप्त हुआ है।

➜ यहाँ से एक बालक की छिद्रयुक्त खोपड़ी प्राप्त हुई है जो शल्य चिकित्सा का प्रमाण है।


धौलावीरा गुजरात के कच्छ जिले  में मनहर एवं मानसेहरा नदियों के बीच कादिर द्वीप पर धौलावीरा स्थित था। खोजा- जे. पी. जोशी ने उत्खनन- 1967-68 में आर. एस. विष्ट ने उत्खनन किया।

धौलावीरा से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य :

➜ राखीगढ़ी के पश्चात् धौलावीरा भारत में स्थित दूसरा सबसे बड़ा स्थल है।

➜ यह  नगर  तीन भागों में विभक्त था। इन तीनों भागों की अलग-अलग किलेबन्दी की गयी थी तदुपरान्त इन तीनों का सम्मिलित रूप से दुर्गीकरण किया गया था।

➜ धौलावीरा में जल प्रबन्धन  के साक्ष्य

➜ सुनामी  का प्राचीनतम साक्ष्य धौलावीरा से मिलता है।

➜ यह भारतीय उपमहाद्वीप में पत्थरों पर पालिश किये जाने का प्राचीनतम प्रमाण है।

➜ यह गिरा हुआ साइनबोर्ड धौलावीरा के उत्तरी द्वार के पास मिला था। आकार में यह 3 मी. लम्बा था और लकड़ी के तख्ते पर जिप्सम से लिखा गया था। यहाँ से एक अन्य चार अक्षरों वाला साइन अभिलेख भी मिला है जिसे सैंधव सभ्यता का बलुआ पत्थर पर लिखित प्राचीनतम अभिलेख माना गया ।

➜ यहाँ से पत्थर के  नेवले के पत्थर की मूर्ति  भी मिली है।

➜ धौलावीरा से राजसभा का अवशेष मिला है।


सुरकोटड़ा : गुजरात के कच्छ जिले में खोजा- 1964 में जगपति जोशी ने की है।

सुरकोटड़ा से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य :

➜ घोड़े की हड्डियाँ सुरकोटड़ा से पायी गयी है।

➜ यहाँ से कुल 4 कलश शवाधानों  का साक्ष्य प्राप्त होता है।

➜ यहाँ से शॉपिंग काम्प्लेक्स, एण्टीमनी की छड़, तराजू का एक पलड़ा एवं कुल्हड़ की प्राप्ति हुई है।

➜ पत्थर की चिनाई वाले भवनों के साक्ष्य यहाँ से भी मिलते हैं।

➜ यहाँ से सफेद चित्रकारी से युक्त काली-लाल रंग की एक नवीन मृदभाण्ड परम्परा अस्तित्व में आयी है।


बनावली : 

➜ हरियाणा के हिसार जिले में रंगोई नदी तट पर स्थित है। उत्खनन- आर. एस. विष्ट ने किया। बनावली सैंधव संस्कृति के तीनों-स्तरों (प्राक, विकसित एवं उत्तर) का प्रतिनिधित्व करता है। यहाँ प्राक सैंधव स्तर से भी नगर-नियोजन का साक्ष्य मिलता है।

बनावली से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य : 

➜ यहाँ से मिट्टी का हल मिला है।

➜ बनावली में पक्की ईंटों का प्रयोग केवल कुआँ, स्नान क्षेत्र व जल निकासी के लिए हुआ है।

➜ बनावली में सम्पूर्ण मोहरों की प्राप्ति केवल निचले नगर क्षेत्र से हुई है, गढ़ी से नहीं।


रोपड़ : पंजाब में सतलज नदी के बायें तट पर रोपड़ स्थित था, खोजा- 1950 में बी.बी. लाल ने ,उत्खनन यज्ञदत्त शर्मा ने किया । स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद उत्खनित पहला स्थल यही है।

रोपड़ से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य :

➜ यहाँ से मालिक के साथ कुत्ता दफनाने का साक्ष्य मिलता है।


राखीगढ़ी : सरस्वती के तट पर हरियाणा के जींद में राखीगढ़ी स्थित था। खोजा- 1969 में सूरजभान ने,  उत्खनन- 1997 में यहाँ अमरेन्द्रनाथ द्वारा उत्खनन प्रारम्भ किया गया।

राखीगढ़ी से प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य :

➜ यहाँ से प्राक, विकसित और उत्तर हड़प्पा के अवशेष मिले हैं।

➜ यह भारत में स्थित सबसे बड़ा हड़प्पन पुरास्थल है।

➜ यहाँ से प्राप्त मुहरों पर कुछ भी उत्कीर्ण नहीं है ।

➜ झुनझुना, मनके बनाने की कार्यशाला एवं लकड़ी का ताबूत प्राप्त

➜  हाल ही में यहाँ से एक युग्म-शवाधान की प्राप्ति हुई है।


माण्डा :-जम्मू में अखनूर तहसील में चिनाब नदी के दायें तट पर स्थित है। यह सिन्धु सभ्यता का सबसे उत्तरी स्थल है। 1982 ई० में जे० पी० जोशी ने इसकी खोज की। यहां से प्राक् हड़प्पा, हड़प्पा एवं हड़प्पोत्तर काल के प्रमाण प्राप्त हुये हैं।

अन्य प्रमुख स्थल :-

बालू- हरियाणा के बालू क्षेत्र से सैंधव सभ्यता का सर्वाधिक फसली साक्ष्य प्राप्त होता है जिसमें दक्षिण व दक्षिण पूर्व एशिया में लहसुन का भी प्राचीनतम साक्ष्य शामिल है। यहाँ के निवासी 'तरबूजा-खरबूजा' भी उगाते थे।

मिताथल- हरियाणा के भिवानी जिले में स्थित इस स्थल की खोज 1968 ई० में सूरजभान ने की। यहाँ से तांबे की ने कुल्हाड़ी तथा 'पान-पात्र' मिले हैं।

आमरी - सिन्धु नदी के दाएं तट पर स्थित इस स्थल की खोज 1929 में एन० जी० मजूमदार ने की थी। यह पहला ऐसा स्थल था जहाँ से सबसे पहले प्राकू-हड़प्पा कालीन अवशेष मिले हैं। यहाँ से बारहसिंहा के प्रमाण प्राप्त हुये हैं।

कोटिदीजी - सिन्धु नदी के बाएं तट पर स्थित इस स्थल का खोज पुराविद् धुर्वे ने 1935 ई० में कीं। यहाँ से प्राक्-हड़प्पा के प्रमाण मिले हैं।

कुणाल - यह हरियाणा में सरस्वती नदी के तट पर स्थित था। यहाँ से दो चाँदी का राजकीय मुकुट, सीप की मुहर तथा सोने के गहने मिले हैं। इस स्थल की खोज 1974 में जे. पी. जोशी एवं आर. एस. विष्ट ने की। हड़प्पा शैली के लाल पात्र एवं मर्तबान पहली बार यहीं से प्राप्त हुए थे।

भगवानपुरा - हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में सरस्वती नदी के दक्षिणी तट पर स्थित इस स्थल से सैन्धव सभ्यता के पतनोन्मुख काल के अवशेष मिलते हैं। इसका उत्खनन जे० पी० जोशी द्वारा करवाया गया।

संघोल - लुधियाना जिले में स्थित इस स्थल की खोज 1968 ई० में एस० एस० तलवार तथा आर० एस० विष्ट द्वारा की गई।

बाड़ा- रोपड़ में स्थित है। इसकी खोज 1956 में यज्ञदत्त शर्मा ने किया।

सोत्काकोह - दक्षिणी बलूचिस्तान में शादीकौर नदी के तट पर स्थित है। इस स्थल की खोज 1962 ई० में जार्ज डेल्स ने की।

डाबरकोट - दक्षिणी बलूचिस्तान में स्थित इस स्थल की खोज ऑरेल स्टाइन ने 1928 ई० में की।

आलमगीरपुर- मेरठ जिले में हिण्डन नदी के तट पर स्थित इस स्थल की खोज 1958 ई० में भारत सेवक समाज द्वारा की गई। इसका उत्खनन कार्य 1958 ई० में यज्ञ दत्त शर्मा ने कराया।सूती कपड़ा (कपास) का साक्ष्य यहाँ से भी मिलता है।

अम्बाखेड़ा एवं बड़गाँव - सहारनपुर जिले में मस्करा नदी के तट पर ये दोनों स्थल स्थित हैं।

माण्डी- यू.पी. के मुजफ्फरनगर जिले में स्थित है। यह सैंधव सभ्यता का नवीनतम उत्खनित स्थल हैं। यहाँ से टकसाल गृह का साक्ष्य मिला है।

हुलास- यू.पी. के सहारनपुर में जिले में स्थित है। यहाँ से स्पष्टतः गेहूँ की खेती के लिए जाने का साक्ष्य मिलते हैं। चाँदीपुर-यू.पी. के बिजनौर में स्थित चाँदीपुर से हड़प्पाकालीन ताम्र-बर्तनों की प्राप्ति हुई है।

शिकारपुर- गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है। यहाँ से सर्वाधिक संख्या में सैन्धव पशुओं की हड्डियाँ मिली हैं।

रंगपुर- यह गुजरात में मादर नदी के तट पर स्थित है। इस स्थल की खोज 1954 में एस.आर. राव ने किया।  धान की भूसी एवं बाजरे का साक्ष्य मिलता है।  यहाँ से मिट्टी की बनी अश्व की दो मूर्तियाँ तथा एक मृदभाण्ड पर भी घोड़ों का अंकन प्राप्त होता है।

सुत्कागेण्डोर - दक्षिणी बलूचिस्तान में दाश्क नदी के तट पर स्थित इस नगर की खोज 1927 ई० में में ऑरेल स्टाइन ने की थी।

अल्लाहदीनों- यह एक बन्दरगाह नगर था ।  अल्लाहदीनो की किलेबंदी नहीं की गयी थी ।

मालवण - सूरत जिले में ताप्ती नदी के मुहाने पर स्थित इस स्थल की खोज 1967 ई० में जे० पी० जोशी तथा आल्चिन दम्पत्ति ने की।

कुन्तासी- गुजरात के राजकोट जिले में स्थित इस स्थल की खुदाई से विकसित तथा उत्तर कालीन सैन्धव संस्कृति प्रकाश में आई है। यह एक बन्दरगाह नगर था।

भगतराव - यह गुजरात की मुख्य भूमि पर धुर दक्षिण का स्थल है

पादरी- गुजरात में स्थित स्थल है। यहाँ से नमक बनाने का बाड़ा भी पाया गया है।

रोजदी- गुजरात के सौराष्ट्र जिले में स्थित है। हाथी के अवशेष मिले हैं।

बालाकोट - बलूचिस्तान के दक्षिण में स्थित इस स्थल का उत्खनन जार्ज एफ० डेल्स ने 1963-76 ई० के दौरान किया था। यह बन्दरगाह नगर था यहाँ का सीप उद्योग प्रसिद्ध था।

नौसारो - पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में स्थित इस स्थान से स्त्रियों की मिट्टी की कुछ ऐसी मूर्तियाँ पायी गई हैं जिनकी माँग में अब भी सिन्दूर भरा हुआ है। आज भी सिन्दूर को हिन्दू स्त्रियों के सुहाग का प्रतीक माना जाता है। इसका उत्खनन जे. फ्रांसोया जैर्रिज ने किया था।

दधेरी- एक परवर्ती हड़प्पीय पुरास्थल है, जो पंजाब प्रान्त के लुधियाना जिले के गोंविदगढ़ के पास स्थित है।

रोहिरा- पंजाब में स्थित हड़प्पायुगीन स्थल है।


सिन्ध सभ्यता की लिपि :

➜ यह लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। सबसे पहले लेखन प्रणाली का विकास मेसोपोटामिया के सुमेरियाई लोगों ने किया था । सिन्धु लिपि में लगभग 64 मूल चिह्न एवं 250 -  400 तक अक्षर हैं।

➜ सिन्धु सभ्यता की लिपि गोमुत्रिका अथवा ब्रूस्ट्रोफिडान है।

➜ हड़प्पा लिपि वर्णनात्मक न होकर भाव चित्रात्मक (पिक्टोग्राफ़) है इसकी लिखावट क्रमशः दायीं ओर से बायीं ओर जाती है।

➜ सैन्धव लिपि में अंग्रेजी के U अक्षर एवं मछली के चित्रों का सर्वाधिक अंकन हुआ है।

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा अभिलेख धौलावीरा से प्राप्त हुआ है।

➜ सैन्धव लिपि को सबसे पहले पढने का दावा एल. ए. वाडेल ने किया था ।


नगरीकरण : हड़प्पा सभ्यता की प्रमुख विशेषता नियोजन एवं जल निकास प्रणाली है।  सैन्धव नगरों का निर्माण सामान्यतः ग्रिड पद्धति पर हुआ था ।

➜ लोथल एवं सुरकोटडा के दुर्ग एवं नगर क्षेत्र एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हुए हैं।

➜ कालीबंगा का दुर्ग एवं नगर क्षेत्र रक्षा प्राचीरों से युक्त था।

➜ धौलावीरा दुर्ग तीन भागों में विभक्त था।

➜ चन्हूदडो की किलेबंदी नहीं की गयी है।

➜ बनावली में दुर्ग एवं नगर अलग अलग न होकर एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हुए थे ।

आवासीय भवन : 

➜ सिन्धु सभ्यता के आवासीय भवन प्रायः पक्की ईंटों द्वारा बनाए गए हैं, केवल कालीबंगा के भवनों का निर्माण कच्ची ईंटों से हुआ है।

➜ मकान दो मंजिला होता था, अधिकतम घरों में सीढ़ियों के साक्ष्य मिले हैं।

घरों के दरबाजे और  खिड़कियाँ गलियों की ओर खुलती थी केवल लोथल में दरबाजे और खिड़कियाँ सड़कों की ओर खुलती थी।

सड़कें : सड़कों प्रायः कच्ची होती थी केवल कालीबंगा की सड़के पक्की हैं। सामान्यतः सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थी।

नालियाँ : नालियाँ प्रायः पक्की ईंटों द्वारा निर्मित होती थी केवल कालीबंगा से लकड़ी द्वारा निर्मित नालियों के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

ईंटें :  हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो पूर्णतः पक्की ईंटों से बने थे जबकि कालीबंगा एवं रंगपुर कच्ची ईंटों द्वारा बने थे।  सिन्धु घाटी सभ्यता से में स्नानागार की फर्श बनाने के लिए जलरोधी ईंटों का प्रयोग किया जाता था।

अन्नागार : मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा एवं लोथल से अन्नागार के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। लोथल से प्राप्त अन्नागार लकड़ी से बना हुआ है।


सैन्धवकालीन मुहरें :

➜ सिन्धु सभ्यता में वर्गाकार मुहरें सर्वाधिक प्रचलित थी। मुहरों के निर्माण में  सैलखड़ी का प्रयोग किया गया था ।

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता की सर्वाधिक मुहरें मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई हैं। मोहनजोदड़ो से एक मुहर पर तीन मुख वाले देवता की मूर्ती भी प्राप्त हुई है इसके चारों ओर हाथी, गैंडा, चीता एवं भैंसा विराजमान हैं। हड़प्पा सभ्यता की मुहरों पर सर्वाधिक अंकन पीपल का उसके बाद एक सींग वाले पशु (यूनिकोर्न) का अंकन हुआ है।


सैन्धव  मृदभांड :

➜ सर्वाधिक  मृदभांड  चाक निर्मित  हैं। 

➜ मृदभांड  पर मुख्यतः लाल अथवा गुलाबी रंग का प्रयोग किया गया है इनके ऊपर काले रंग से आकृतियाँ बनाई गयी हैं।


नाप-तौल :

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता में तौल की इकाई संभवतः 16 के अनुपात में थी।

सिन्धु घाटी सभ्यता के बाँट घनाकार थे।

मोहनजोदड़ो से सीप का बना हुआ पैमाना एवं लोथल से हाथी दांत का बना हुआ पैमाना मिला है।


राजनैतिक स्थिति :

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता में नगरो का आधार  व्यापार एवं वाणिज्य था ।

➜ डॉ. आर. एस. शर्मा के अनुसार हड़प्पा का शासन संभवतः वणिक वर्ग के हाथ में था।


धार्मिक स्थिति :

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता से मंदिर के कोई अवशेष प्राप्त नहीं हुए हैं।

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता में मुख्य रूप से एक कूबड़ वाले सांड और वृक्ष पूजा के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

➜ मोहनजोदड़ो की एक मुहर से स्वास्तिक चिह्न प्राप्त हुआ है।

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता में मुख्यता : मातृदेवी की पूजा होती थी और पशुपति शिव दुसरे प्रमुख देवता थे  ।

➜ हड़प्पा सभ्यता में पृथ्वी को उर्वरता की देवी के रूप मान कर पूजा की जाती थी।


आर्थिक स्थिति :

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता में आर्थिक जीवन का आधार कृषि, पशुपालन और व्यापार था।

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता के किसी भी स्थल से नहरो के साक्ष्य नही प्राप्त होते है ।

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग कई फसलों से परिचित थे – गेहूं,चावल, जौ,  बाजरा, ज्वार,कपास, रागी

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता से गन्ने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है।

➜ मेहरगढ़ से कपास के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।


कृषि : 

➜ कालीबंगा  से जूते हुए खेत के प्रमाण प्राप्त हुए है । 

➜ लोथल से आटा पीसने की पत्थर की चक्की के दो पाट मिले हैं।


पशुपालन : 

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग गाय, बैल, भेड़, बकरी,  कुत्ते, बिल्ली, गधे, हाथी, ऊँट, बाघ, हिरन, गैंडे,  आदि से परिचित थे। 

➜ सिन्धु सभ्यता में घोड़े के अस्तित्त्व को स्वीकार नही किया जाता है ।

➜ सिन्धु सभ्यता की किसी भी मुहर से गाय , ऊँट और  घोड़े का अंकन नही है ।


व्यापार  :

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता में व्यापार वस्तु-विनिमय प्रणाली द्वारा होता था।

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता का मुख्य उद्योग वस्त्र उद्योग था।

➜ सिन्धु घाटी सभ्यता की मुहरों  पर नाव अंकन मिलता है और  मिटटी से बना हुआ नाव का मॉडल और  बंदरगाह के साक्ष्य लोथल से प्राप्त हुए  है।


सिन्धु घाटी सभ्यता पतन के कारण :

➜ बाढ़, जलवायु परिवर्तन , भूकम्प , नदी मार्ग परिवर्तन, बाह्य आक्रमण(सबसे कम मान्य)

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