Irani and Unani aakraman

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विदेशी आक्रमण 

 ईरानी/पारसीक (हखामनी वंश) आक्रमण 

प्राचीन काल से भारत व ईरान का सांस्कृतिक सम्बन्ध था। 

ईरानी ग्रंथ जिन्द अवेस्ता में भारत की सिन्धु नदी को हिन्दू नदी तथा संप्तसेंधव प्रदेश को हफ्तहेंदव प्रदेश कहा गया है।


भारत पर सबसे पहला विदेशी आक्रमण ईरानियों या फारसियों द्वारा किया गया। 

558 ई. पू. - 530 ई. पू. के मध्य ईरान के शासक साइरस द्वितीय ने सर्वप्रथम भारत पर आक्रमण किया, किन्तु वह भारत के किसी भू-भाग को जीतने में असफल रहा। 

516 ई. पू. में डेरियस/दारा प्रथम ने आक्रमण कर भारत के पश्चिमोत्तर भाग को अपने 20वें प्रान्त में शामिल किया।

 इतिहास के पिता कहे जाने वाले हेरोडोटस ने अपनी पुस्तक हिस्टोरिका में लिखा है कि इस प्रान्त से दारा को 360 टैलेण्ट स्वर्ण धूलि की आय प्राप्त होती थी।

पारसीक सम्पर्क के फलस्वरूप भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेशों में खरोष्ठी लिपि का जन्म हुआ, जो ईरानी व आरमेइक लिपि से उत्पन्न हुई थी। 

भारत और ईरान के सम्बन्ध के कारण यहां ईरानी मुद्रा डेरिक (स्वर्ण मुद्रा) व सिगलोई (रजत मुद्रा) प्रचलित हुई।

कुछ विद्धानों के अनुसार मौर्य वंश के शासक अशोक ने हखामनी सम्राटों से प्रेरणा लेते हुए ही स्तम्भों व शिलाओं पर घोषणाएं खुदवाई थीं तथा स्तम्भों के शीर्ष पर घण्टा की आकृति बनवाई थी। 


यूनानी/ग्रीक आक्रमण

सिकन्दर का जन्म 356 ई. पू. में यूनान के मकदूनिया/मेसिडोनिया प्रान्त में हुआ था। 

वह 336 ई. पू. में अपने पिता फिलिप की मृत्यु के पश्चात् यूनान का शासक बना। 

सिकन्दर के गुरू का नाम अरस्तू था। 

सिकन्दर विश्व विजेता बनने की इच्छा की पूर्ति हेतु विजय अभियान पर निकला। 

इस क्रम में उसने भारत पर 326 ई. पू. में आक्रमण किया। 

इस अभियान में सिकन्दर के सहयोगी सेनापति नियार्कस, आनेसिक्रटस, अरिस्टोवुल्स, सेल्यूकस, क्रेटरस आदि थे। 

इस समय मगध का शासक धनानन्द था। 

भारत में सर्वप्रथम सिकन्दर के सम्मुख सिंध व झेलम नदी के बीच स्थित तक्षशिला के राजा आम्भी ने आत्मसमर्पण कर दिया तथा आगे के विजय अभियान में सिकन्दर की सहायता की।


झेलम वितस्ता का युद्ध (326 ई. पू.)- सिकन्दर का भारत में सबसे सशक्त विरोध झेलम तथा चिनाब के मध्यवर्ती प्रदेश के शासक पोरस (पूरू) ने किया। 

युद्ध में अद्भुत वीरता दिखाने के बावजूद भी पोरस पराजित हुआ। 

बाद में सिकन्दर ने पोरस को उसका राज्य वापस कर दिया। 


सिकन्दर की सेना ने व्यास नदी से आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। 

इस दौरान सिकन्दर 19 महीने भारत में रहा तथा कुछ महत्वपूर्ण नगरों की स्थापना की, जैसे - निकैया (विजयनगर), बुकेफाल (अपने घोडे के नाम पर) तथा सिकन्दरिया (सिंध)। 

वापस लौटने से पूर्व सिकन्दर ने अपने सम्पूर्ण विजित क्षेत्र को 4 प्रशासनिक इकाइयों में बांट दिया -

1. प्रथम प्रांत - सिंध नदी के पश्चमी में स्थित भ-भाग फिलिप के अधीन। 

2. द्वितीय प्रांत - सिंधु व झेलम के बीच स्थित भू-भाग आम्भी के अधीन। 

3.  तृतीय प्रांत - झेलम व व्यास नदी के बीच स्थित भू-भाग पोरस के अधीन। 

4.  चतुर्थ प्रांत - सिंधु नदी के निचला भू-भाग पिथोन के अधीन।



सिकन्दर को वापस लौटते समय मालव, क्षुद्रक, अश्वक आदि गणराज्यों के विरोध का सामना करना पड़ा। 

इनमें से अश्वक गणराज्य की स्त्रियों ने भी सिकन्दर के विरूद्ध युद्ध में भाग लिया था। अंततः इन सभी गणराज्यों को जीतते हुए सिकन्दर सिन्धु नदी के मुहाने पर पहुंचा तथा अपनी सेना को दो भाग में विभक्त किया। 

सेना का एक भाग, जल सेनापति नियार्कस के नेतृत्व में जल मार्ग से वापस लौटा, जबकि दूसरा भाग, सिकन्दर के नेतृत्व में स्थल मार्ग से वापस लौटा। 

रास्ते में 323 ई. पू. में बेबीलोन (ईराक ) में सिकन्दर की मृत्यु हो गई। 

सिकन्दर के आक्रमण का भारत को सर्वप्रमुख लाभ यह हुआ कि सिकन्दर के आक्रमण की तिथि 326 ई.पू. ने भारत के क्रमागत इतिहास को लिखने में बड़ी सहायता की। 

साथ ही भारत में यूनानी संपर्क के परिणामस्वरूप यूनानी मुद्राओं के अनुकरण पर उलूक शैली के सिक्के भी ढाले जाने लगे।


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