Maratha Empire in Hindi

Maratha Empire in Hindi
Maratha Empire in Hindi 


मराठा साम्राज्य 

मराठों के उद्भव के कारण 

 1. महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति - यहां की उबड़-खाबड़ जमींन तथा जलवायु ने मराठों को दृढ़ परिश्रमी और लड़ाकू बनाया।(राइज ऑफ द मराठा पॉवर-महादेव गोविंद रानाडे)। 

2. औरंगजेब की हिंदू विरोधी नीति। 

3. भक्ति आंदोलन (दास बोध - गुरू रामदास)

4. दक्षिण की तत्कालीन स्थिति - (अहमदनगर राज्य का बिखराव)

5. शिवाजी का चमत्कारी व्यक्तित्व

शिवाजी (1627-1680 ई.) 

जन्म - 1627 ई. को शिवनेर के किले में।

माता - जीजाबाई। 

पिता - शाहजी भोंसले (बीजापुर के शासक के यहां कार्यरत थे)। 

संरक्षक - दादाजी कोंडदेव। गुरू - समर्थ गुरू रामदास।

विवाह - 1640 ई. में साईबाई से। 

शिवाजी के प्रारंभिक अभियान बीजापुर के आदिलशाही राज्य के विरुद्ध शुरू हुए। 1643 ई. में शिवाजी ने सर्वप्रथम सिंहगढ़ का किला जीता। तत्पश्चात् 1646 ई. में तोरण तथा 1654 ई. में पुरंदर का किला भी जीत लिया। शिवाजी की इन साहसिक विजयों से बीजापुर का सुल्तान क्रोधित हो गया तथा उसने शिवाजी के विरुद्ध अफजल खां के नेतृत्व में सेना भेजी। 


अफजल खां से संघर्ष ( 1659 ई.)

अफजल खां ने कूटनीतिपूर्वक शिवाजी को मारने की योजना बनाई तथा शिवाजी के पास संधि का प्रस्ताव भेजा। शिवाजी ने अफजल खां की कूटनीति को समझते हुए संधि के अनुरूप प्रतापगढ़ के जंगलों में उससे मिलने गए। जहां अफजल खां सशस्त्र आया था तथा गले मिलने के बहाने शिवाजी की हत्या करने का प्रयास किया, किन्तु इसके विपरीत शिवाजी ने अपने बगनखे के वार से अफजल खां को मार डाला। इस हमले में शिवाजी को भारी धन-संपत्ति तथा अस्त्र-शस्त्र प्राप्त हुए, जिससे उनकी प्रतिष्ठा तथा स्थिति और भी अधिक सुदृढ़ हो गई।

शाइस्ता खां से संघर्ष (1663 ई.)

अफजल खां की हत्या से उत्साहित होकर शिवाजी ने मुगलों पर जोरदार आक्रमण किए तथा उनके कई महत्वपूर्ण दुर्गों पर अधिकार कर लिया, जिससे तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब नाराज हो गया। औरंगजेब ने शिवाजी के विरुद्ध शाइस्ता खां को विशाल सेना के साथ भेजा। शाइस्ता खां ने प्रारंभ में कई मराठा प्रदेशों को रोंद डाला। 1663 ई. में शाइस्ता खां ने वर्षा ऋतु पूना में बिताने की योजना बनाई। शिवाजी ने अपने सैनिकों को भेष बदलकर पूना भेजा तथा मौका देखकर मुगल सेना पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण से शाइस्ता खां का अंगूठा कट गया तथा वह डर कर भाग खड़ा हुआ। 


सूरत की प्रथम लूट (1664 ई.)

शाइस्ता खां को पराजित कर उत्साहित होकर शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण कर वहां से 1 करोड़ रुपए प्राप्त किए। इसके उपरान्त औरंगजेब ने राजा जयसिंह को शिवाजी से युद्ध करने भेजा। 


जयसिंह से संघर्ष तथा पुंरदर की संधि ( 1665 ई.)

जयसिंह ने वीरता व चालाकी से मराठों के कई किले जीत लिए। अन्ततः विवश होकर शिवाजी ने पुरन्दर की संधि कर ली। इस संधि के अनुसार शिवाजी ने 35 में से 23 किले मुगलों को दे दिए तथा मुगलों की ओर से युद्ध करने का वचन दिया। साथ ही शिवाजी ने अपने पुत्र शंभाजी को मुगल दरबार में भेजा, जहां उन्हें 5 हजार का मनसब दिया गया।


1666 ई. में शिवाजी बीजापुर के विरुद्ध मुगलों की सहायता न मिलने के कारण औरंगजेब से मिलने आगरा गए, जहां राजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह ने शिवाजी की सुरक्षा की गारंटी ली। दरबार में शिवाजी को 5 हजार के मनसबदारों की पंक्ति में खड़ा कर दिया गया, जिससे शिवाजी नाराज हो गए। शिवाजी को बंदी बनाकर आगरा स्थित जयपूर महल में रखा गया, किन्तु शिवाजी ने कुटनीति का सहारा लिया तथा मिठाई व फल की टोकरी में बैठकर भाग निकले। 


सूरत की द्वितीय लूट (1670 ई.) 

शिवाजी ने 1670 ई. में सूरत को पुनः लूटा। 


शिवाजी का राज्याभिषेक (1674 ई.)

शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक 1674 ई. में रायगढ़ (राजधानी) में काशी के प्रसिद्ध पंडित गंगाभट्ट से करवाया तथा छत्रपति व हैन्दव धर्मोद्धारक की उपाधि ग्रहण की। इस प्रकार शिवाजी ने 1674 ई. में स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना की। 


कर्नाटक अभियान (1676-78 ई.)

यह शिवाजी का अंतिम अभियान था। 1678 ई. में शिवाजी ने जिंजी का किला जीत लिया। जिंजी की विजय शिवाजी की अंतिम विजय थी। 


1680 ई. में अत्यधिक ज्वर के कारण शिवाजी के मृत्यु हो गई। शिवाजी की 7 पत्नियां थीं। शिवाजी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी पुतलीबाई सती हो गई थी। 


शिवाजी का प्रशासन


अष्ट प्रधान परिषद 

शिवाजी की सहायता व परामर्श के लिए 8 मंत्रियों की एक परिषद थी, जिसे अष्ट प्रधान कहा जाता था। अष्ट प्रधान परिषद का प्रत्येक मंत्री अपने विभाग का प्रमुख था, किन्तु ये मंत्री शिवाजी के प्रसादपर्यन्त होते थे तथा इनकी स्थिति सचिव से अधिक नहीं होती थी।


1. पेशवा (प्रधानमंत्री) - यह सम्पूर्ण प्रशासन का पर्यवेक्षण व निरीक्षण करता था। 

2. अमात्य ( मजुमदार) - वित्त मंत्री। 

3. सचिव (सुरनविस या चिटनिस) - पत्रचार विभाग का प्रमुख। 

4. मंत्री (वाकयानविस) - यह दरबारी कार्यों का रिकॉर्ड रखता था तथा गुप्तचर व सूचना विभाग का प्रमुख। 

5. सेनापति ( सर-ए-नौबत) - सेना का नेतृत्वकर्ता। 

6. सुमंत ( दबीर) - विदेश मंत्री। 

7. पंडित राव - धार्मिक बातों में छत्रपति का परामर्शदाता। 

8. न्यायाधीश - न्याय विभाग का प्रमुख।



भू-राजस्व व्यवस्था

शिवाजी ने 1679 ई. में अन्नाजी दत्तो द्वारा भूमि सर्वेक्षण करवाया तथा भूमि माप की पद्धति अपनाई। शिवाजी ने रस्सी के बदले काठी (मानक छड़ी) से भूमि की माप करवाई। भू-राजस्व की राशि प्रारंभ में 33 प्रतिशत, किन्तु बाद में बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दी गई थी। 


चौथ व सरदेशमुखी

शिवाजी का साम्राज्य स्वराज में विभाजित था। स्वराज ऐसा क्षेत्र था, जो प्रत्यक्षत: मराठों के नियंत्रण में होता था, जबकि मुघतई उस क्षेत्र को कहते थे, जहां से शिवाजी चौथ व सरदेशमुखी वसूल करते थे।


चौथ यह पड़ोसी राज्यों से उनके क्षेत्र पर आक्रमण व लूटपाट न करने के बदले वसूल किया जाता था, जो राज्य की आय का 1/4 भाग होता था। 


सरदेशमुखी

शिवाजी महाराष्ट्र क्षेत्र का सरदेशमुख होने के नाते विजित क्षेत्र से उसके कुल राजस्व का 10 प्रतिशत सरदेशमुखी के रूप में प्राप्त करते थे। सरदेशमुखी वसूल करना शिवाजी अपना कानूनी अधिकारी मानते थे, क्योंकि वे महाराष्ट्र के पुश्तैनी सरदेशमुख थे। 


सैन्य प्रशासन

शिवाजी की सेना में पैदल सेना, अश्वारोही सेना, तोपखाना व नौ-सेना शामिल थी। 

अश्वारोही सेना के संगठन को पागा कहा जाता था। इसमें दो प्रकार के सैनिक होते थे - बरगीर एवं सिलेदार। बरगीर को राज्य की ओर से घोडे एवं शस्त्र प्राप्त होते थे, जबकि सिलेदार इनका प्रबंध स्वयं करते थे। 


अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

अंग्रेज इतिहासकार स्मिथ ने शिवाजी के राज्य को डाकू राज्य कहा है। 

औरंगजेब ने शिवाजी को पहाड़ी चूहा कहा है। 

शिवाजी को गुरिल्ला युद्ध पद्धति का जनक भी कहा जाता है। 

मराठा विलेखों में मोड़ी लिपि का प्रयोग किया जाता था। 


शिवाजी के उत्तराधिकारी 


शंभाजी (1680-89 ई.)

1680 ई. में शिवाजी की मृत्यु के पश्चात् शिवाजी की दो पत्नियों से उत्पन्न दो पुत्रों शंभाजी एवं राजाराम के मध्य उत्तराधिकार का विवाद उत्पन्न हो गया। हालांकि शिवाजी की मृत्यु के समय शंभाजी पन्हाला के किले में कैद थे, जिसका फायदा उठाते हुए राजाराम ने स्वयं को शासक घोषित कर दिया था। किन्तु शीघ्र ही शंभाजी को मुक्त कर दिया गया तथा उन्होंने राजाराम को गद्दी से उतारकर स्वयं सिंहासन प्राप्त कर लिया। फरवरी, 1689 ई. में संगमेश्वर में  मुगल सेनापति मुकर्रम खां ने शंभाजी और कविकलश को बंदी बना लिया तथा दोनों की हत्या कर दी।


राजाराम ( 1689-1700 ई.)

शंभाजी की मृत्यु के समय उनका पुत्र शाहू केवल 7 वर्ष का था, अतः राजाराम को मराठा शासक नियुक्त किया गया। 

1691 ई. में मुगल सेनापति जुल्फीकार खां ने जींजी का घेरा डाला, 8 वर्षों तक राजाराम जीजी के किले में कैद रहा। 

1698 ई. में राजाराम जीजी से सतारा भागने में सफल रहा तथा सतारा को अपनी राजधानी बनाई। 

1700 ई. में सतारा में ही उनकी मृत्यु हो गई। 


शिवाजी द्वितीय ( 1700-1707 ई.)

राजाराम की मृत्यु के बाद उसका अल्पवयस्क पुत्र शिवाजी द्वितीय शासक बना तथा राजाराम की पत्नी ताराबाई उसकी संरक्षिका बनी। 

इस प्रकार औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के समय मराठों का नेतृत्व ताराबाई के हाथों में था। 

मराठों में आपसी संघर्ष को बढ़ावा देने हेतु 1707 ई. में जुल्फीकार खां के कहने पर बहादुरशाह प्रथम ने शाहू को कैद से मुक्त कर दिया। 


शाहूजी ( 1707-1749 ई.)

शाहूजी शंभाजी के पुत्र थे, उसकी मां का नाम येसूबाई था। 

1707 ई. में शाहूजी व ताराबाई की सेना में खेड़ा का युद्ध हुआ। 

इस युद्ध में ताराबाई ने शाहूजी के विरुद्ध धन्नाजी जादव के नेतृत्व में सेना भेजी थी। 

धन्नाजी जादव शाहूजी के पक्ष में चला गया, जिससे ताराबाई की पराजय हो गई तथा वह दक्षिणी महाराष्ट्र भाग गई। 

शाहूजी ने 1708 ई. में सतारा में अपना राज्याभिषेक किया तथा सतारा को अपनी राजधानी बनाई। 

इसी वर्ष शाहूजी ने एक नया पद सेनाकर्ते (सेना को संगठित करने वाला) का गठन किया तथा इस पद पर बालाजी विश्वनाथ को नियुक्त किया।

इस प्रकार मराठा दो भागों में बंट गए - उत्तर में शाहूजी के अधीन सतारा राज्य तथा दक्षिण में शिवाजी द्वितीय के अधीन कोल्हापुर राज्य। 

दोनों मराठों राज्यों के मध्य तब संघर्ष समाप्त हुआ, जब शिवाजी द्वितीय की मृत्यु के बाद राजाराम की दूसरी पत्नी से उत्पन्न पुत्र शंभाजी द्वितीय कोल्हापुर की गद्दी पर बैठा। 

1731 ई. में शंभाजी द्वितीय ने शाहूजी के साथ वारना की संधि कर ली। इस संधि के अनुसार शंभाजी ने कोल्हापुर से तथा शाहूजी ने सतारा से शासन करना स्वीकार कर लिया। 


राजाराम द्वितीय (1749-1750 ई.)

1749 ई. में शाहूजी की मृत्यु हो गई। शाहूजी के दत्तक पुत्र राजाराम द्वितीय को छत्रपति बनाया गया। 

1750 ई. में पेशवा बालाजी बाजीराव से राजाराम द्वितीय ने संगोला की संधि कर ली, जिसके अनुसार मराठा संगठन का वास्तविक नेता पेशवा बन गया। 

छत्रपति नाममात्र का प्रधान रह गया तथा सतारा के किले में बंदी की तरह जीवन व्यतीत करने लगा। 


पेशवा का इतिहास 


बालाजी विश्वनाथ (1713-20 ई.)

बालाजी विश्वनाथ को मराठा साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक माना जाता है। 

1708 ई. में शाहूजी ने इन्हें सेनाकर्ते का पद प्रदान किया। 

1713 ई. में इन्हें पेशवा नियुक्त किया गया। 

बालाजी विश्वनाथ की मुख्य सफलता 1719 ई. में मुगल बादशाह की ओर से (सैय्यद बंधुओं द्वारा) मराठों से की गई संधि थी। 

इस संधि के अनुसार से मराठों को दक्षिण भारत के 6 सूबों से चौथ व सरदेखमुखी वसूल करने की अनुमति दे दी गई। इसके बदले में शाहूजी ने मुगलों को 15,000 घुड़सवार सैनिकों की सहायता तथा प्रतिवर्ष 10 लाख रुपए देना स्वीकार किया था। इस संधि को रिचर्ड टेम्पल ने मराठों का मेग्नाकार्टा कहा है। 


बाजीराव प्रथम ( 1720-40 ई.)

बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा बना। 

इसे लड़ाकू पेशवा तथा शिवाजी के पश्चात् गुरिल्ला युद्ध पद्धति का सबसे बड़ा प्रतिपादक कहा जाता है। 

बाजीराव प्रथम ने हिन्दू पद पादशाही के आदर्श का प्रचार किया। 

मुगल साम्राज्य के संबंध में बाजीराव प्रथम ने कहा कि “सड़े हुए वृक्ष के तने पर प्रहार करो, शाखाएं तो स्वयं ही गिर जाएंगी।”


निजाम से संघर्ष ( 1728 ई.)

बाजीराव ने 1728 ई. में पालखेड़ा के युद्ध में निजामुलमुल्क को पराजित किया तथा उससे मुंगी शिवगांव की संधि की। इस संधि के अनुसार निजाम ने शाहूजी को चौथ तथा सरदेशमुखी देना, शंभाजी द्वितीय की सहायता न करना आदि का वचन दिया। इस संधि के उपरान्त शंभाजी द्वितीय को निजाम की सहायता मिलना बंद हो गई, जिससे उसने 1731 ई. में वारना की संधि से शाहूजी की अधीनता स्वीकार कर ली।


मालवा विजय (1728 ई.)

बाजीराव प्रथम ने 1728 ई. में मालवा पर आक्रमण कर यहां के मुगल गवर्नर गिरधर बहादुर को अमझेरा के युद्ध में पराजित किया। इसके उपरान्त भी मालवा में मराठों के आक्रमण होते रहे। अन्ततः 1735 ई. तक मालवा पर मुगलों की सत्ता लगभग समाप्त हो गई।


बुन्देलखण्ड विजय (1728 ई.)

बुन्देलखण्ड इलाहाबाद की सूबेदारी में था। जब इलाहाबाद के मुगल गवर्नर मुहम्मद खां बंगस ने बुन्देलखण्ड के नरेश छत्रसाल को अपने अधीन लाने का प्रयास किया, तब छत्रसाल ने बाजीराव प्रथम से सहायता मांगी। 1728 ई. में मराठों ने बुन्देलखण्ड के सभी विजित प्रदेश मुगलों से छीन लिए। छत्रसाल ने पेशवा की शान में एक दरबार का आयोजन किया। दरबार में एक मुस्लिम नृत्यकी मस्तानी को पेश किया गया। साथ ही कालपी, सागर, झांसी तथा हृदय नगर पेशवा को निजी जागीर के रूप में दी गई।


गुजरात विजय (1731-38 ई.)

गुजरात से भी मराठे चौथ व सरदेशमुखी वसूल करते थे। शाहूजी ने यहां त्रम्बकराव को नियुक्त किया था। त्रम्बकराव स्वयं गुजरात व मालवा के राजस्व पर अपना अधिकार चाहता था। अतः 1731 ई. में बाजीराव प्रथम ने त्रम्बकराव के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही कर उसे मौत के घाट उतार दिया। अन्ततः 1738 ई. में गुजरात को मराठा राज्य में मिला लिया गया।


दिल्ली विजय ( 1737 ई.)

1737 ई. में बाजीराव प्रथम अपनी सेना के साथ दिल्ली पहुंचा, वह वहां केवल 3 दिन ठहरा। मुगल बादशाह मोहम्मदशाह द्वारा मालवा की सूबेदारी तथा 13 लाख वार्षिक धनराशि का आश्वासन दिए जाने पर बाजीराव प्रथम वहां से हट गया।  मुगल बादशाह ने निजाम को मराठों के विरुद्ध भेजा। दोनों पक्षों के बीच 1737 ई. में भोपाल का युद्ध हुआ, जिसमें निजाम की पराजय हुई तथा 1738 ई. में हुई दुरई सराय की संधि के अनुसार निजाम ने मालवा पर मराठों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया।


बसीन एवं सालसेट विजय (1739 ई.) 

1739 ई. में मराठों ने पुर्तगालियों से बसीन एवं सालसेट छीन लिया। 


मराठा परिसंधीय व्यवस्था

बाजीराव प्रथम के शासनकाल में रानोजी सिंधिया ने प्रारंभ में उज्जैन फिर ग्वालियर में, मल्हारराव होल्कर ने इन्दौर में, पिलाजी गायकवाड ने बड़ौदा में एवं रघुजी भोसले ने नागपुर में क्षेत्रीय शक्ति अर्जित कर ली। 


बालाजी बाजीराव ( 1740-61 ई.)

बाजीराव प्रथम की मृत्यु के उपरान्त उनका पुत्र बालाजी बाजीराव (नाना साहब) पेशवा हुए। इनके काल में मराठा राज्य का सर्वाधिक प्रसार हुआ।


संगोला की संधि ( 1750 ई.)

1750 ई. में बालाजी बाजीराव तथा छत्रपति राजाराम द्वितीय के मध्य संगोला की संधि हुई, जिसके अनुसार छत्रपति नाममात्र का राजा रह गया, जबकि वास्तविक शक्ति पेशवा में निहित हो गई।


पूर्वी अभियान (1751 ई.)

1751 ई. में रघुजी भोसले ने बंगाल पर आक्रमण कर अलीवर्दी खां को पराजित किया। अलीवार्दी खां ने मराठों को उड़ीसा का क्षेत्र तथा बंगाल व बिहार से चौथ (12 लाख वार्षिक) प्राप्त करने का अधिकार दे दिया।


निजाम से युद्ध (1757-60 ई.)

1745 ई. में निजामुलमुल्क की मृत्यु के पश्चात् हैदराबाद में गृह युद्ध प्रारंभ हो गया। ऐसी स्थिति में मराठा आक्रमण से बचने हेतु 1752 ई. में भलकी की संधि द्वारा बरार का आधा क्षेत्र मराठों को दे दिया गया। किन्तु शीघ्र ही हैदराबाद में मुजफ्फरजंग का शासन स्थापित होते ही उसने मराठों को 1757 ई. में सिन्दखेड़ के युद्ध में तथा 1760 ई. में उदगीर के युद्ध में चुनौती दी। इन दोनों युद्धों में निजाम की पराजय हुई, अतः विवश होकर निजाम को एक बड़ा क्षेत्र (अहमदनगर, दौलताबाद, बुरहानपुर एवं बीजापुर) मराठों को देना पड़ा।


दिल्ली अभियान (1758 ई.)

अहमदशाह अब्दाली ने 1757 ई. में पंजाब सहित सम्पूर्ण दिल्ली पर अधिकार कर आलमगीर द्वितीय को मुगल सम्राट, इमादुलमुल्क को वजीर, रूहेला सरदार नजीबुद्दौला को मीर बख्शी व अपना मुख्य एजेंट तथा तैमूरशाह को पंजाब का गवर्नर बनाकर वापस चला गया। 1752 ई. में हुई संधि के अनुसार मुगल साम्राज्य की रक्षा हेतु, 1758 ई. में मराठा सेनापति रघुनाथ राव दिल्ली पहुंचे। रघुनाथ राव ने दिल्ली तथा पंजाब पर आक्रमण कर वहां से क्रमशः नजीबुद्दोला व अब्दाली के पुत्र तैमूरशाह को बाहर निकाल दिया। इसके बाद रघुनाथ राव ने पंजाब का गवर्नर अदीना बेग खां तथा उसके बाद में साबाजी सिंधिया को बनाकर दक्कन वापस आ गया। इस प्रकार मराठों का दबदबा कटक से अटक तक हो गया।


पानीपत का तृतीय युद्ध ( 14 जनवरी, 1761 ई.)

1759 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने मराठों को दण्डित करने हेतु पुनः भारत पर आक्रमण किया। जनवरी, 1760 ई. में रास्ते में बरारी घाट के युद्ध में साबाजी सिंधिया व दत्ताजी सिंधिया मारे गए। आगे बढ़कर अब्दाली ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। बालाजी बाजीराव ने सदाशिवराव और विश्वासराव भाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना दिल्ली भेजी।

पानीपत का तृतीय युद्ध 14 जनवरी 1761 में अहमदशाह अब्दाली तथा मराठों के बीच हुआ। इस युद्ध में अवध का नवाब शुजाउद्दौला, रुहेला सरदार नजीबुद्दौला, हाफिज रहमत खां, सादुल्ला खां, डुंडी खां आदि ने अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया, जबकि मराठों की लूटमार की आदतों से चिढ़कर सूरजमल जाट, सिक्खों और राजपूतों ने मराठों का साथ छोड़ दिया। मराठों के तोफखाने का नेतृत्व इब्राहिम गार्दी खां ने संभाला, किन्तु मराठों की भारी-भरकम तोपें अब्दाली की शुतुरनाल तोपों के मुकाबले बेकार साबित हुई। इस युद्ध में सदाशिवराव भाऊ, विश्वासराव भाऊ, जसवंतराव पवार, तुकोजी सिंधिया जैसे महान मराठा सरदार तथा 28,000 मराठा सिपाही मारे गए। मल्हारराव होल्कर युद्ध से भाग गया। इस प्रकार पानीपत के तृतीय युद्ध में अहमदशाह अब्दाली की विजय हुई। पानीपत के तृतीय युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी काशीराम पंडित के शब्दों में “पानीपत का तृतीय युद्ध मराठों के लिए प्रलयंकारी सिद्ध हुआ।"


माधवराव ( 1761-72 ई.)

पानीपत के तृतीय युद्ध में पराजित हो जाने के शोक में शीघ्र ही बालाजी बाजीराव की मृत्यु हो गई। इसके उपरान्त मराठों का नेतृत्व पेशवा माधवराव ने संभाला। माधवराव अंतिम महान पेशवा थे, जो मराठों की शक्ति को पुनः स्थापित कर सके। माधवराव ने हैदराबाद के निजाम तथा मैसूर के हैदर अली को चौथ देने के लिए बाध्य किया। इन्हीं के काल में 1772 ई. में मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय को इलाहाबाद से दिल्ली लाया गया तथा मुगल बादशाह ने मराठों का संरक्षण स्वीकार कर लिया। किन्तु 1772 ई. में आकस्मात क्षय रोग से माधवराव की मृत्यु हो गई। 


नारायणराव ( 1772-73 ई.)

माधवराव की मृत्यु के बाद उनका छोटे भाई नारायणराव पेशवा बना, किन्तु 1773 ई. में उसके चाचा रघुनाथराव (राघोवा) ने पेशवा की हत्या कर दी। 


माधव नारायणराव (1774-95 ई.)

नाना फडनवीस की सलाह पर नारायणराव की मृत्यु के बाद उसके अल्पवयस्क पुत्र माधव नारायणराव (माधवराव द्वितीय) को पेशवा बनाया गया। इससे रघुनाथराव, जो स्वयं पेशवा बनना चाहता था, ने नाराज होकर मुम्बई जाकर अंग्रेजों से सहायता मांगी। उसके इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास ने आंग्ल-मराठा संघर्ष की भूमिका तैयार कर दी। 


आंग्ल-मराठा युद्ध 


प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-82 ई.)

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध रघुनाथराव की महत्वाकांक्षा का परिणाम था। माधवराव नारायणराव के पेशवा बनने के बाद रघुनाथराव ने अंग्रेजों से सहायता मांगी। बॉम्बे कौन्सिल ने गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स से अनुमति लिए बगैर रघुनाथराव से 1775 ई. में सूरत की संधि कर ली। इसी के साथ प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध प्रारंभ हो गया।


सूरत की संधि (1775 ई.) इस संधि में तय हुआ कि अंग्रेज रघुनाथराव को पेशवा बनाने में मदद करेंगे। इसके बदले में अंग्रेजों को सालसेट और बसीन प्राप्त होगा। 


पुरंदर की संधि ( 1776 ई.)

कलकत्ता कौन्सिल ने बम्बई सरकार की सूरत संधि को मानने से इनकार कर दिया। बंगाल के गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने पुनः मराठों से पुरंदर की संधि की, जिसके अनुसार सूरत की संधि को रद्द कर दिया गया, अंग्रेज रघुनाथराव को कोई सहायता नहीं देंगे एवं बदले में सालसेट अंग्रेजों को प्राप्त होगा। परन्तु यह संधि लागू नहीं हो पाई, क्योंकि कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने सूरत की संधि को वैध माना। अतः बम्बई कौन्सिल ने पुनः युद्ध छेड़ दिया। 

1779 ई. में मराठों ने अंग्रेजों को तलगांव के युद्ध में पराजित किया तथा बड़गांव की संधि की।


बड़गांव की संधि ( 1779 ई.) इस संधि के अनुसार अंग्रेजों को बंबई कौन्सिल द्वारा जीती गई समस्त भूमि लौटानी पड़ी, सालसेट भी अंग्रेजों के हाथ से निकल गया।


वॉरेन हेस्टिंग्स ने इस अपमानजनक संधि को मानने से इनकार कर दिया तथा पुनः युद्ध आरंभ कर दिया। इसी समय ब्रिटिश सेना द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84 ई.) में भी उलझी हुई थी। अतः सैन्य दबाव को कम करने हेतु वॉरेन हेस्टिंग्स ने मराठों से संधि करना उचित समझा। अंततः महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से अंग्रेजों तथा पेशवा के मध्य सालबाई की संधि हो गई।


सालबाई की संधि ( 1782 ई.)

इस संधि के अनुसार माधवराव नारायणराव को पेशवा स्वीकार कर लिया गया, सालसेट द्वीप अंग्रेजों को प्राप्त हुआ एवं अंग्रेजों ने रघुनाथराव का पक्ष छोड़ दिया। 


द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1802-05 ई.)

सालबाई की संधि 20 वर्षीय युद्ध विराम थी। शीघ्र ही द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध प्रारंभ हो गया। 1800 ई. तक सभी महत्वपूर्ण मराठा सरदार मर चुके थे। 1794 ई. में महादजी सिंधिया, 1795 ई. में माधव नारायणराव, 1799 ई. में तुकोजी होल्कर तथा 1800 ई. में नाना फडनवीस की मृत्यु हो गई थी। 1795 ई. में माधव नारायणराव की मृत्यु के उपरान्त बाजीराव द्वितीय पेशवा (अंतिम पेशवा) बना। आपसी विवाद के चलते पेशवा बाजीराव द्वितीय व दौलतराव सिंधिया ने जसवंतराव होल्कर के छोटे भाई विठ्ठजी की हत्या कर दी, जिससे क्रुद्ध होकर जसवंतराव होल्कर ने पूना पर अधिकार कर लिया। बाजीराव द्वितीय ने भागकर अंग्रेजों की शरण ली तथा बसीन की संधि कर ली।



बसीन की संधि ( 1802 ई.)

इस संधि के द्वारा बाजीराव द्वितीय की सुरक्षा हेतु पूना में ब्रिटिश रेजिमेंट रख दिया गया, जिसका खर्च बाजीराव द्वितीय को वहन करना था। यह एक सहायक संधि थी। इस संधि के उपरान्त बाजीराव द्वितीय को अपनी गलती का एहसास हुआ। भोंसले एवं सिंधिया ने भी बाजीराव द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष प्रारंभ कर दिया, जबकि होल्कर अंग्रेजों से अलग से संघर्ष कर रहा था। गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेज्ली ने उत्तरी कमान लॉर्ड लेक तथा दक्षिणी कमान आर्थर वेलेस्ली को सौंपी। अंततः सभी मराठा शक्तियां पराजित हुई तथा विवश होकर उन्हें अंग्रेजों से अलग-अलग संधियां करनी पड़ी।


अंग्रेजों ने भोंसले के साथ देवगांव की संधि (1803 ई.), सिंधिया के साथ सुर्जी अर्जन गांव की संधि (1803 ई.) तथा होल्कर के साथ राजपुर घाट की संधि (1805 ई.) की। इस तरह द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध ने मराठा संघ को कमजोर कर दिया। 


तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-18 ई.)

1816 ई. में रघुजी भोसले की मृत्यु के पश्चात् उसका उत्तराधिकारी अल्पवयस्क पुत्र परशुजी बना। परशुजी का संरक्षक उसकी माता बुकाबाई व अप्पा साहब को बनाया गया। अप्पा साहब स्वयं सम्पूर्ण शक्ति अर्जित करना चाहते थे। अतः उसने अंग्रेजों की सहायता प्राप्त करने हेतु 1816 ई. में नागपुर की संधि कर ली, जो सहायक संधि थी।


गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने पिंडारियों के दमन के बहाने बाजीराव द्वितीय पर मराठा संघ को समाप्त करने का दबाव डाला। बाजीराव द्वितीय ने इनकार करते हुए संघर्ष प्रारंभ कर दिया, किन्तु वह पराजित हुआ। अंग्रेजों ने 1817 ई. में बाजीराव द्वितीय से पूना की संधि की, जिसके अनुसार मराठा संघ को समाप्त कर दिया गया तथा बाजीराव द्वितीय को पेंशन देकर बिठुर (कानपुर) भेज दिया गया।


अंग्रेजों ने सिंधिया पर भी सैन्य कार्यवाही कर उसे संधि हेतु विवश किया। 1817 ई. में अंग्रेजों व सिंधिया के मध्य ग्वालियर की संधि हुई, जो सहायक संधि थी। उसी प्रकार होल्कर को भी पराजित कर उसे संधि हेतु विवश किया गया। 1818 ई. में अंग्रेजों व होल्कर के मध्य मंदसौर की संधि हुई, जो सहायक संधि थी।


तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के पश्चात् सतारा का हिस्सा निकालकर शिवाजी के वंशज प्रतापसिंह को दे दिया गया, जबकि शेष भाग को मिलाकर 1818 ई. में मुम्बई प्रेसिडेंसी की स्थापना की गई।


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